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स निर्मल सिंह विर्क की क़लम से - Uturn Time
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पंजाब/यूटर्न/1 अप्रैल। रिमांड शब्द से अभिप्राय मारपीट से नहीं है जैसा कि आम बोलचाल की भाषा में प्रचलन है। रिमांड अवधि के दौरान गिरफ्तार किए गए व्यक्ति से पूछताछ मात्र है , पर रिमांड अवधि के दौरान कुछ प्राधिकारी लोग मारपीट कर सूचना उगलवाने की कोशिश करते हैं, हालांकि संवैधानिक तौर पर मारपीट करने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है । भारतीय संविधान ने प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता से जीने का अधिकार दिया है, एक व्यक्ति को गिरफ्तार करने का सीधा अर्थ यह है कि उसे उसकी स्वतंत्रता से वंचित करना। किसी भी स्तर पर आपराधिक मामले होने पर प्रायः पुलिस मारपीट करती है। कई बार टॉर्चर से पुलिस हिरासत में मौत भी हो जाती है। ऐसी घटनाएं आमतौर पर देश के किसी न किसी कौन में घटती ही रहती है । रिमांड अवधि के दौरान अधिकारी द्वारा केवल पूछताछ करना होता है , न कि इसका मतलब मारपीट से होता है, पर कुछ प्राधिकारी लोग स्वयं का रिस्क लेकर रिमांड अवधि के दौरान गिरफ्तार किए गए व्यक्ति आतंकित कर या धमकियां देकर जबरन अपराध स्वीकार कराने की कोशिश करते हैं, ऐसे में मारपीट की वजह से पीड़ा ने सहते हुए व्यक्ति की मौत हो जाती हैं। जिससे मृत्तक व्यक्ति के परिवार को वालों को भी बड़ी मुश्किलातों का सामना करना पड़ता है । मृतक के परिवार को दिया गया दर्द मानसिक बीमारी के रूप में पनप लेता है । जिससे शरीर को हानि हो जाती है। हालांकि कि ऐसा नहीं है कि मृतक व्यक्ति की मौत की आंच पुलिस प्राधिकारियों तक नही पहुंचती। वे भी एक नये किस्म के अपराध में शामिल हो जाते हैं। जिसका सीधा असर उनके परिवार आर्थिक और मानसिक तौर पर पड़ता है। पुलिस जितनी भी निष्पक्ष जांच कर ले , पर प्राधिकारी लोग अपने ही साथी लोगों की ही फेवर की बात करते हैं । ऐसे में मृत्यु होने पर न तो न्यायालय पालिका अपनी जिम्मेदारी लेती है, और न ही वह डॉक्टर जो हर 6 घंटे पर गिरफ्तार व्यक्ति का मेडिकल करता है। वास्तव में प्राधिकारी गिरफ्तार किया व्यक्ति को मारपीट का इतना डरा देते हैं कि वह मेडिकल डॉक्टर के सामने कुछ भी बोल नहीं पाता । और न ही डॉक्टर उसके किसी भी प्रकार से शरीर के निशान को चेक करते हैं , सिर्फ गिरफ्तार व्यक्ति का फिट होने का प्रमाण दे देते हैं , ऐसे में डॉक्टर भी अपनी जिम्मेदारी से बच निकलता है । अब यह देखना है कि मानवाधिकार क्या कहता है कि मेरा कार्य वहां से शुरू होता है जहां से शोषण आरंभ होता है। मानव समिति का कार्य तब शुरू होता है, जब उत्पीड़न संबंधी घटना घट चुकी होती है । इनका कार्य घटना स्थल का दौरा करना , मृत्यु कैसे हुई , रिपोर्ट प्राप्त करना और समिति को दी हुई शक्ति का प्रयोग करके अपने स्तर पर सरकार को रिपोर्ट पेश करना व सिफारिश करना इत्यादि शामिल हैं। अब सवाल यह उठता है कि बड़े-बड़े यूरोपीय विकसित देशों में भी संगीन किस्म के अपराध होते हैं , वहां पर भी अपराधी अपना अपराध स्वीकार करता है, उन देशों में भारत की तरह टार्चर से मौतें नहीं होती , उन देशों में मानवाधिकार के सार्वभौमिक घोषणा पत्र ,1948 का कड़ाई से पालन होता है । भारत देश में किसी न किसी हिस्से में ऐसे ही प्रायः मौतें होती रहती हैं और किसी गैर जिम्मेदाराना व्यवहार या अनदेखी के कारण होती है, इसी कारण से भारत में मानव अधिकारों की आलोचना होती है । अब स्थिति यह बनती है, कि मौत के अंतराल के समापन के लिए बीच में एक और तृतीय पक्ष की आवश्यकता महसूस हो जाती है , न्यायपालिका , डॉक्टर , पुलिस , समाज या संगठन के बुद्धिजीवी लोग और पूर्ण शक्तियों के साथ अन्य नया पक्ष, यानी एक प्रकार से जिला सत्र पर सीधे गैर सरकारी संगठन की मांग ,यह जरूरी नहीं है, कि मानव समाज के सभी कार्य पैसे के लिए ही हो , एक सभ्य मानव होने के नाते भी समाज के कल्याण के लिए कार्य किए जा सकते हैं जिला स्तर पर गैर सरकारी संगठन का कार्य रिमांड अवधि के दौरान गिरफ्तार व्यक्ति को भय मुक्त वातावरण प्रदान करना , नियमानुसार हर 6 घंटे पर मेडिकल अपने सामने करवाना , मेडिकल के समय पुरुष को दूरी बनाए रखने के लिए कहना, गलत प्राधिकरण का तबादला करने की पावर होना , गिरफ्तार व्यक्ति के शरीर के चोट निशान को देखना , पैरों , पीठ व शरीर पर चोट के निशान देखना , गिरफ्तार व्यक्ति को कम से कम 50 मीटर की दूरी तक पैदल चलवा कर देखना और मेडिकल फिटनेस प्रमाण पत्र के साथ गैर सरकारी संगठनों के हस्ताक्षर इत्यादि करना यही समय की मांग है। इस तरह मानवाधिकारों के वायोलेशन फेस होने पर , एड्रेस और सोल्यूशन कर सकते हैं। जिससे पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों पर अंकुश लगाया जा सकता है।