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ज़िले के 21 गांवों में विधानसभा आरक्षण व्यवस्था को लेकर असंतोष और जनभावना खुलकर सामने आने लगी है। ग्रामीणों ने इसे “अधूरी आज़ादी” बताते हुए आगामी परिसीमन में निष्पक्ष पुनर्मूल्यांकन की मांग उठाई है। डॉ. नवीन नैन भालसी ने कहा कि 1947 में देश आज़ाद हुआ और 1966 में हरियाणा अलग राज्य बना, लेकिन पानीपत के कई गांव आज भी बार-बार आरक्षित विधानसभा क्षेत्रों में शामिल होकर स्वयं को रिजर्वेशन की जकड़न में बंधा महसूस कर रहे हैं। पहले असन्ध (रिजर्व) और बाद में इसराना (रिजर्व) में शामिल किए जाने से इन गांवों में वर्षों से उपेक्षा और असमान प्रतिनिधित्व की भावना बनी हुई है। डॉ नवीन नैन भालसी ने कहा कि यह राजनीति नहीं, बल्कि जनहित, सामाजिक न्याय और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का प्रश्न है। युवाओं में निराशा, मेहनतकश परिवारों में उपेक्षा और सामाजिक संतुलन पर असर अब जनचिंता का विषय बन चुका है। भालसी, मडलौडा, वैसर, वैसरी, लोहारी, उंटला, बोहली, सिठाना, खण्डरा, बाल-जट्टान, शेरा, धर्मगढ़, रेर कलां, थिराना, जोशी, माजरा, कवि, नारा, आदियाना, आसन और थर्मल सहित 21 गांवों के लोग एकजुट होकर सरकार और चुनाव आयोग से मांग कर रहे हैं । आगामी लोकसभा / विधानसभा परिसीमन में इन गांवों की स्थिति की निष्पक्ष समीक्षा की जाए। ग्रामीणों ने मांग रखी कि इन गांवों को वर्तमान आरक्षण व्यवस्था से बाहर रखने पर विचार किया जाए तथा जनसंख्या, भौगोलिक स्थिति और जनभावना के आधार पर न्यायपूर्ण पुनर्मूल्यांकन किया जाए। डॉ. नवीन नैन भालसी ने कहा— “देश आज़ाद है, हरियाणा आज़ाद है… अब इन गांवों को भी न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व की आज़ादी मिलनी चाहिए।” डॉ नवीन नैन भालसी व उक्त सभी ग्राम वासियों ने सरकार से आग्रह किया कि 21 गांवों की इस पुरानी मांग को गंभीरता से सुनते हुए समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।