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चंडीगढ़/यूटर्न/1 जून। सुप्रीम कोर्ट ने अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम (आईटीपीए) का विश्लेषण करते हुए यह टिप्पणी की कि 70 साल पुराने इस कानून के प्रावधान पुलिस को उन वयस्कों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार नहीं देते, जो अपनी मर्ज़ी से सेक्स वर्क में शामिल हैं, क्योंकि यह काम अपने आप में गैर-कानूनी नहीं है। कोर्ट ने आगे कहा कि हालांकि वेश्यालय चलाना गैर-कानूनी है, लेकिन छापेमारी के दौरान पाए जाने वाले सेक्स वर्कर्स को पीड़ित नहीं बनाया जाना चाहिए और न ही उन्हें हिरासत में लिया जाना चाहिए। सेक्स वर्कर्स के पुनर्वास के संबंध में अधिकारियों को निर्देश जारी करते हुए, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि पुलिस को अपनी मर्ज़ी से सेक्स वर्क में शामिल वयस्कों को परेशान करने से बचना चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार, पीठ ने कहा, इसका तर्क सीधा-सा था; चूंकि ऐसी महिलाएं अपनी मर्ज़ी से वेश्यावृत्ति में शामिल हैं, इसलिए उनके 'बचाव' का सवाल ही नहीं उठता। सेक्स वर्कर का पुनर्वास बिना मर्ज़ी करना गलत कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि किसी भी सेक्स वर्कर का पुनर्वास उसकी मर्ज़ी के खिलाफ नहीं किया जाना चाहिए और पुनर्वास की कोई भी प्रक्रिया ज़बरदस्ती वाली नहीं, बल्कि सेक्स वर्कर्स की अपनी मर्ज़ी पर आधारित होनी चाहिए। कोर्ट ने आगे कहा, पुनर्वास का संवैधानिक अधिकार राज्य को इस बात के लिए बाध्य करता है कि वह पीड़ितों को पुनर्वास के लिए ज़रूरी साधन और सहायता उपलब्ध कराए। हालांकि, यह राज्य को इस बात का अधिकार नहीं देता कि वह किसी पीड़ित की मर्ज़ी के खिलाफ उस पर पुनर्वास की प्रक्रिया थोपे। कोर्ट ने मान्यताओं को किया खारिज कोर्ट ने आईटीपीए की धारा 17 के मौजूदा ढांचे के तहत मौजूद उन मान्यताओं को भी खारिज कर दिया, जिन्हें उसने पितृसत्तात्मक बताया। कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान अक्सर वेश्यावृत्ति से जुड़ी स्थितियों से बचाए गए सभी लोगों के साथ एक जैसा ही बर्ताव करता है, चाहे उनकी तस्करी की गई हो, उन पर ज़बरदस्ती की गई हो, या फिर वे अपनी मर्ज़ी से सेक्स वर्क में शामिल हुए हों। ---