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मोहाली/यूटर्न/22 मई। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने सामूहिक दुष्कर्म जैसे गंभीर आरोप लगाकर बाद में उसे गलतफहमी बताने वाली महिला पर सख्त रुख अपनाते हुए 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। अदालत ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 376-डी जैसे गंभीर मामलों में इस तरह कानून का इस्तेमाल न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इससे महिलाओं की गरिमा भी प्रभावित होती है। यह आदेश जस्टिस आलोक जैन ने उस याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें समझौते के आधार पर एफआईआर रद्द करने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द तो कर दी, लेकिन शिकायतकर्ता के आचरण पर कड़ी टिप्पणी करते हुए उस पर एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया। साथ ही आरोपी पक्ष की ओर से भी 10-10 हजार रुपए जमा कराने के निर्देश दिए गए। समझौता बिना दबाव के हुआ सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि पहले कोर्ट ने दोनों पक्षों को संबंधित मजिस्ट्रेट और ट्रायल कोर्ट के सामने बयान दर्ज कराने के लिए कहा था। इसके बाद पठानकोट के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि दोनों पक्षों के बीच हुआ समझौता पूरी तरह स्वेच्छा से और बिना किसी दबाव, डर या लालच के हुआ है। राज्य सरकार और शिकायतकर्ता के वकील ने भी एफआईआर रद्द करने का विरोध नहीं किया। देरी से शिकायत दर्ज, मेडिकल सबूत भी नहीं मिले जस्टिस आलोक जैन ने कहा कि शिकायतकर्ता ने कई लोगों पर सामूहिक दुष्कर्म जैसे गंभीर आरोप लगाए, लेकिन घटना की रिपोर्ट दर्ज कराने में हुई देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया। अदालत ने यह भी कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए कोई मेडिकल सबूत नहीं मिला। बाद में शिकायतकर्ता ने समझौता कर कहा कि एफआईआर गलतफहमी से दर्ज कराई। हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इतने गंभीर आरोपों को बाद में गलतफहमी बताना साफ दर्शाता है कि शिकायतकर्ता ने कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया और अधिकारियों को गुमराह करने के साथ आरोपियों पर अनुचित दबाव बनाने की कोशिश की। ---