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उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर दल बदल का खेल शुरू हो गया है। बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पार्टी के प्रमुख मुस्लिम चेहरे के रूप में जाने जाने वाले डॉ. एम. एच. खान ने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया है। अखिलेश यादव ने खुद उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाई। इस घटना को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। एक तरफ इसे मायावती के लिए बड़ा झटका बताया जा रहा है, तो दूसरी तरफ जानकार यह भी कह रहे हैं कि डॉ. खान के जाने से बसपा को जमीनी स्तर पर बहुत अधिक नुकसान होने की संभावना नहीं है। पहले यह समझना जरूरी है कि डॉ. एम. एच. खान बसपा में क्या भूमिका निभा रहे थे। वे पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता थे और मुस्लिम समुदाय में पार्टी का चेहरा माने जाते थे। जब भी बसपा को मुस्लिम मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचानी होती थी, डॉ. खान आगे आते थे। टेलीविजन की बहसों में, सार्वजनिक मंचों पर और पत्रकारों से बातचीत में वे बसपा के पक्ष में जोरदार तर्क रखते थे। उनकी बोलने की क्षमता और तर्क करने का तरीका उन्हें एक प्रभावशाली प्रवक्ता बनाता था। लेकिन राजनीति केवल बोलने से नहीं चलती। राजनीति में जमीनी ताकत की अहमियत सबसे ज्यादा होती है। और यहीं पर डॉ. खान की सीमाएं सामने आती हैं। वे एक बौद्धिक और वाकपटु नेता हैं, लेकिन गांव-गांव में उनकी पहुंच नहीं है। जिला स्तर पर, बूथ स्तर पर उनका कोई संगठन नहीं है। मुस्लिम मतदाताओं के बीच उनकी अपनी कोई व्यक्तिगत पकड़ नहीं है, जो उनके साथ किसी दूसरी पार्टी में चली जाए। ऐसे में उनके बसपा छोड़ने से पार्टी को कितना वास्तविक नुकसान होगा, यह सोचने वाली बात है। बसपा और मुस्लिम मतदाताओं का रिश्ता हमेशा से जटिल रहा है। मायावती ने कई बार मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देकर और मुस्लिम हितों की बात करके इस समुदाय को अपनी तरफ खींचने की कोशिश की है। लेकिन मुस्लिम मतदाता हमेशा यह देखता है कि उसका वोट कहां जाने से उसके हित सबसे अधिक सुरक्षित रहेंगे। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता लंबे समय से समाजवादी पार्टी के साथ रहा है। अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा काफी हद तक बनाए रखा है। ऐसे में जब डॉ. खान जैसे नेता बसपा छोड़कर समाजवादी पार्टी में जाते हैं, तो इसका संदेश प्रतीकात्मक रूप से जरूर जाता है। यह संदेश यह है कि मुस्लिम समुदाय का बसपा से मोहभंग हो रहा है। यह संदेश मायावती की उस कोशिश को नुकसान पहुंचाता है, जिसमें वे मुस्लिम समुदाय को अपने पाले में लाने की लगातार जुगत भिड़ाती रहती हैं। लेकिन प्रतीकात्मक नुकसान और जमीनी नुकसान में फर्क होता है।अब सवाल यह उठता है कि अखिलेश यादव को डॉ. खान को शामिल करने से क्या मिलेगा। समाजवादी पार्टी के लिए यह एक चतुर राजनीतिक चाल है। डॉ. खान एक पढ़े-लिखे और मुखर नेता हैं। पार्टी उन्हें अपने मीडिया अभियानों में, बहसों में और मुस्लिम समुदाय तक अपनी बात पहुंचाने में इस्तेमाल कर सकती है। इसके अलावा, बसपा से किसी वरिष्ठ नेता का आना यह भी दिखाता है कि समाजवादी पार्टी की ताकत बढ़ रही है और विपक्षी खेमे में उसकी साख मजबूत है। मायावती के लिए यह घटना एक और कारण से परेशान करने वाली है। बसपा पिछले कुछ वर्षों से लगातार कमजोर होती जा रही है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता या तो पार्टी छोड़ चुके हैं या किनारे कर दिए गए हैं। संगठन कमजोर हुआ है, चुनावी प्रदर्शन खराब हुआ है और पार्टी की जमीनी पकड़ घटी है। ऐसे दौर में डॉ. खान जैसे एक प्रमुख प्रवक्ता का जाना, भले ही जमीनी नुकसान न पहुंचाए, लेकिन पार्टी की छवि को और कमजोर करता है। राजनीति में कभी-कभी प्रतीकों की ताकत बहुत बड़ी होती है। जब कोई नेता पार्टी छोड़ता है, तो वह एक संदेश देता है। यह संदेश उन लोगों तक भी जाता है, जो अभी भी पार्टी में हैं। यह संदेश उन मतदाताओं तक भी जाता है, जो पार्टी को वोट देने के बारे में सोच रहे हैं। डॉ. खान का जाना बसपा के भीतर मौजूद उन लोगों को भी सोचने पर मजबूर करेगा, जो पार्टी के भविष्य को लेकर संशय में हैं।हालांकि, यह भी सच है कि बसपा का मूल वोट आधार दलित समुदाय है। मायावती की असली ताकत उत्तर प्रदेश के दलित मतदाताओं में है। मुस्लिम मतदाता बसपा के लिए एक अतिरिक्त जोड़ रहे हैं, मूल आधार नहीं। इसलिए एक मुस्लिम प्रवक्ता के जाने से पार्टी के मूल ढांचे को कोई विशेष खतरा नहीं है।डॉ. खान की यह पार्टी पलटी उत्तर प्रदेश की राजनीति की उस पुरानी परंपरा का हिस्सा है, जिसमें नेता अपने हित और मौके देखकर पार्टियां बदलते रहते हैं। यह परंपरा न नई है, न अनोखी। लेकिन जब यह होता है, तो राजनीतिक समीकरणों पर इसका असर जरूर पड़ता है, चाहे वह असर बड़ा हो या छोटा।कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि डॉ. एम. एच. खान का बसपा छोड़कर समाजवादी पार्टी में जाना मायावती के लिए एक प्रतीकात्मक झटका जरूर है। यह उनकी मुस्लिम मतदाताओं को साधने की कोशिशों को थोड़ा कमजोर करता है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि डॉ. खान एक जनाधार वाले नेता नहीं हैं। उनके जाने से बसपा के वोट बैंक पर सीधा असर पड़ने की संभावना बहुत कम है। राजनीति में असली ताकत जमीन से आती है, और वह जमीन डॉ. खान के पास नहीं थी। इसलिए यह घटना मायावती के लिए एक सीमित नुकसान है, विनाशकारी नहीं।