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शनिवार का दिन था। बाज़ार की भीड़ थम चुकी थी, और गली के कोने पर रमेश की चाय की टपरी पर सिर्फ़ दो ग्राहक बैठे थे — एक बूढ़े मास्टर जी और एक 10 साल का बच्चा, अर्जुन। मास्टर जी रोज़ एक कप चाय पीते, बिना चीनी की। अर्जुन हर शनिवार आता और एक गिलास पानी माँगता, पीता और चला जाता। रमेश कई हफ़्तों से देख रहा था, पर कुछ पूछा नहीं। आज अर्जुन ने पानी पीकर कहा, “भइया, आज चाय पिला दोगे? पैसे कल दे दूँगा।” रमेश मुस्कुराया, “बेटा, चाय 10 रुपये की है। कल नहीं, जब हो तब दे देना।” अर्जुन ने चाय पी, आँखों में चमक थी। जाते-जाते बोला, “मास्टर जी मुझे हर शनिवार पढ़ाते हैं। आज उन्होंने मेरी कॉपी पर लिखा — ‘तुम बड़े आदमी बनोगे’। इसलिए सोचा, आज चाय पी लूँ।” मास्टर जी ने यह सुना तो चुपचाप अपनी जेब से 100 रुपये निकाले और रमेश को देते हुए बोले, “इस बच्चे की हर शनिवार की चाय मेरी तरफ से। जब तक मैं हूँ।” रमेश की आँखें नम हो गईं। उसने अर्जुन को पुकारा, “बेटा, अब हर शनिवार तुम्हारी चाय फ्री। बस तुम पढ़ते रहो।” अर्जुन दौड़ता हुआ गया, और पीछे रह गई एक छोटी सी सीख — कभी-कभी एक कप चाय सिर्फ़ चाय नहीं होती, वो किसी के हौसले का सहारा बन जाती है। शनिवार आएगा, कोई न कोई अर्जुन आएगा… आप बस रमेश बन जाइए।