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शहर में लगातार मिल रही बम धमकियों के बीच चंडीगढ़ पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जानकारी के अनुसार बम डिटेक्शन टीम में तैनात 28 कर्मियों में से आठ जवान ऐसे हैं, जिन्होंने बम डिटेक्शन का कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया है। इसके बावजूद ये जवान पिछले तीन से चार वर्षों से टीम में सक्रिय ड्यूटी निभा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, पूर्व डीजीपी सुरेंदर यादव के कार्यकाल में प्रशिक्षित जवानों के तबादले के बाद बिना प्रशिक्षण वाले कर्मियों को टीम में शामिल कर लिया गया। बम डिटेक्शन का विशेष प्रशिक्षण जालंधर और मानेसर में होता है, लेकिन पिछले करीब चार वर्षों से यह प्रक्रिया ठप बताई जा रही है। बताया जा रहा है कि बम की सूचना मिलने पर मौके पर पहुंचने वाले जवान जोखिम के बीच काम करने को मजबूर हैं। हाल ही में 30 से अधिक स्कूलों और कई सरकारी व सार्वजनिक स्थानों एयरपोर्ट, पासपोर्ट कार्यालय, जिला अदालत, हाईकोर्ट और सचिवालय को बम से उड़ाने की धमकियां मिल चुकी हैं। इन मामलों में कई-कई घंटों तक सर्च ऑपरेशन चला, जिससे टीम की सीमित संख्या और संसाधनों की कमी उजागर हुई। एक साथ कई स्थानों पर जांच की जरूरत पड़ने पर टीमों को बारी-बारी से सर्च करना पड़ा। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, शहर की बम डिटेक्शन टीम फिलहाल केवल संदिग्ध वस्तुओं की पहचान तक सीमित है। विस्फोटक को निष्क्रिय करने की आधुनिक तकनीक और उपकरणों का भी अभाव बताया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, पहले भी बम मिलने की घटनाओं में सेना या अन्य विशेष एजेंसियों की मदद लेनी पड़ी है। ऐसे में लगातार बढ़ती धमकियों के बीच टीम की क्षमता और प्रशिक्षण को लेकर सवाल और गहरे हो गए हैं।