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सन 2015 की तरह बेमौसमी बरसात के कारण फरवरी-मार्च में डेंगू के मामले सामने आने लगे और धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ने लगी जॉब 350 मरीजो के पार हो चुकी है परंतु स्वास्थ्य विभाग है कि मानने को तैयार ही नहीं अधिकारियों का कहना है की अब तक एक ही मरीज में डेंगू पॉजिटिव आया है शेष सब तो शंका के घेरे में है अगर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी सही कह रहे हैं तो वह अस्पतालों के विरुद्ध एक्शन क्यों नहीं लेते जो मरीजों में डेंगू पॉजिटिव बात कर उन्हें कई दिन अस्पताल में भर्ती रखते हैं क्या अस्पताल प्रबंधकों के कहना कि यह स्वास्थ्य विभाग का हर वर्ष का काम है हमारे यहां मरीज पॉजिटिव आता है और लक्षणों के आधार पर उसका डेंगू बांधकर ही उपचार किया जाता है उसके बाद वह ठीक होकर घर चला जाता है स्वास्थ्य विभाग को है इसके कई फायदे डेंगू के मरीज सामने आने पर उसे संदिग्ध करार देने के बाद ना तो कोई सर्वे करना पड़ता है ना ही सप्रे, बस हेड ऑफिस रिपोर्ट भेजनी होती है कि सब ठीक-ठाक है इससे मैनपावर की समस्या भी अपने आप सुलझ जाती है और छिड़काव करने वाली दवाइयां का खर्चा भी नहीं होता इससे उच्च अधिकारी भी काफी खुश रहते हैं और कहते हैं की स्थिति कंट्रोल में है परंतु हालत तब विस्फोटक हो जाते हैं जब स्वास्थ्य विभाग की लापरवाहियों के कारण साधारण रोग भी महामारी में बदल जाता है तब यह कहा जाता है कि हमने तो लोगों को जागरूक किया परंतु लोगों ने सहयोग नहीं किया। नगर निगम से तालमेल में कमी मलेरिया और डेंगू के प्रकोप पर काबू पाने के लिए स्वास्थ्य विभाग और नगर निगम के साथ-साथ अन्य विभागों को भी मिलजुल कर काम करने को कहा जाता है परंतु स्वास्थ्य विभाग नगर निगम सभी तालमेल नहीं रख पाता हर बार बीमारी बढ़ने पर जिलाधीश को एक विशेष मीटिंग बुलाकर सभी को परस्पर सहयोग से काम करने को कहा जाता है इस बार भी बीमारी के महामारी बनने का इंतजार किया जा रहा है स्वास्थ्य निदेशक के निर्देश रह जाते हैं हवा में हर वर्ष किसी महामारी के आगमन के अवसर पर उससे बचाव के लिए स्वास्थ्य निदेशक द्वारा कई तरह के निर्देश देकर अधिकारियों को उस पर काम करने को कहा जाता है जिसमें सभी सरकारी व गैर-सरकारी अस्पतालों को निर्देश जारी कर हर संदिग्ध मरीज का सैंपल भी सिविल अस्पताल में जांच के लिए भेजने को कहा जाता है। लोगों का कहना है कि सभी विभागों को इस मुहिम में शामिल करने तथा उचित प्रबंधों के लिए जिलाधीश की अध्यक्षता में तुरन्त बैठक बुलाई जाए कैसे करें प्रबन्ध *स्वास्थ्य निदेशक द्वारा सभी सिविल अस्पतालों तथा प्राइमरी हैल्थ सैंटरों में अलग से डेंगू वार्ड बनाने तथा वार्ड में मच्छर दानियों के प्रबंध करने को कहा जाता है। *डेंगू के मरीजों के लिए अलग से वार्ड का प्रबन्ध हो। *किसी क्षेत्र में डेंगू का संदिग्ध मरीज भी सामने आता है तो आटोमोल्जिकल सर्वे कराया जाए, दवा का छिड़काव कराया जाए और रिपोर्ट तुरन्त उन्हें भेजी जाए। *डेंगू के पुष्ट मरीजों के उपचार के साथ उसके घर के आसपास आवश्यक कदम उठाए जाएं। आसपास के घरों में स्प्रे कराने के अलावा मरीज की पूर्व व वर्तमान इतिहास (डेंगू बुखार सम्बन्धी) जानकारी एकत्रित की जाए। *दूसरे जिलों से सम्बन्धित मरीजों की जानकारी ई-मेल द्वारा सम्बन्धित सिविल सर्जन को दी जाए ताकि वह रैमीडियल बचाव कार्य कर सके। डेंगू के संदिग्ध व पॉजिटिव मरीजों की रिपोर्ट हैड आफिस भेजी जाए। *डेंगू के मरीज का टैस्ट किस किट द्वारा जांच के बाद कम्फर्म किया गया स्पष्ट किया जाए। *डेंगू, चिकनगुनिया की मासिक रिपोर्ट हर महीने 5 तारीख से पहले भेजी जानी चाहिएं। *बचाव व रोकथाम सम्बन्धी निर्देश म्युनिसिपल कमेटियों तथा नगर निगम को भी भेजे जाएं। *सभी स्कूलों (सरकारी व निजी) में डेंगू बुखार से रोकथाम तथा बचाव करने के बारे में जागरूकता कार्यक्रम किए जाएं। विशेषज्ञों का कहना है कि एलिजा जांच में कई बार डेंगू के बारे में एक सप्ताह बाद दोबारा ब्लड टेस्ट लेकर जांच करने से स्थिति स्पष्ट होती है। और ना ही स्वास्थ्य विभाग इसकी अस्पतालों से मांग करता है परंतु किसी भी मरीज का एलिजा टेस्ट वीकली नहीं किया जाता इसी बीच मरीज ठीक होकर घर चला जाता है डेंगू के सामने आ रहे मामलों पर सेहत अधिकारी खासे परेशान हैं। हालांकि वह मच्छर की जीवन शैली या उसके म्युटेशन में बदलाव की बात नहीं मान रहे पर उनकी चिताएं जरूर बढ़ गई है। जिला मलेरिया अफसर किसी भी रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं करते परंतु विशेषज्ञों का कहना है कि कूलरों के पैडों में अगर मच्छर के अंडे रह जाएं तो वह पानी से जीवंत हो सकते हैं इसलिए ही लोगों को कूलरों के पुराने पैड जला देने को कहा जाता है स्वास्थ्य विभाग ने अब तक ना तो लोगों को जागरूक करने के लिए टीमों का गठन किया है और ना ही अन्य विभागों से तालमेल बिठा पाया है