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भारत-यूरोपीय संघ महाडील:- बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की रणनीतिक छलांग-मदर ऑफ ऑल डील और 21वीं सदी की नई वैश्विक आर्थिक- राजनीतिक धुरी-एक समग्र विश्लेषण - Uturn Time
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भारत-ईयू महाडील वैश्विक दक्षिण और बहुपक्षीय व्यवस्था के लिए भी नई संभावनाएँ खोलेगी भारत-यूरोपीय संघ महाडील 21वीं सदी की बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की रणनीतिक सोच,आर्थिक आत्मविश्वास और कूटनीतिक परिपक्वता का प्रमाण है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया - वैश्विक स्तरपर भारत और यूरोपीय संघ के बीच संपन्न हुई ऐतिहासिक महाडील केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति,अर्थव्यवस्था और कूटनीति में उभरते भारत की निर्णायक भूमिका का प्रतीक बनकर सामने आई है।भारतीय पीएम द्वारा इसे मदर ऑफ ऑल डील कहा जाना अपने- आप में इस समझौते के व्यापक प्रभाव, दूरगामी निहितार्थ और रणनीतिक महत्व को रेखांकित करता है। मंगलवार, 27 जनवरी को आयोजित 16 वें भारत- यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में जिस प्रकार मुक्त व्यापार समझौते पर वार्ता पूरी होने की औपचारिक घोषणा की गई और साथ ही सुरक्षा व रक्षा सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर हुए,उसने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत और यूरोप अब केवल आर्थिक साझेदार नहीं,बल्कि रणनीतिक सहयोगी के रूप में आगे बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यह शिखर सम्मेलन उस दौर में हुआ है जब विश्व व्यवस्था तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया में अस्थिरता आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्गठन और संरक्षणवाद की बढ़ती प्रवृत्तियाँ वैश्विक व्यापार और राजनीति की दिशा को प्रभावित कर रही हैं।ऐसे समय में भारत- ईयू महाडील एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभरती दिखाई देती है, जो न केवल दोनों पक्षों के हितों को साधेगी,बल्कि वैश्विक दक्षिण और बहुपक्षीय व्यवस्था के लिए भी नई संभावनाएँ खोलेगी।पीएम ने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा की मेजबानी करते हुए जिस आत्मविश्वास के साथ यह घोषणा की कि भारत ने अपने इतिहास का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार समझौता पूरा कर लिया है,वह भारत की आर्थिक कूटनीति में आए आत्मविश्वासपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है।अधिकारियों के अनुसार कानूनी जांच के बाद लगभग छह महीनों में एफटीए पर औपचारिक हस्ताक्षर हो जाएंगे और इसके अगले वर्ष प्रभाव में आने की संभावना है।यह समय- सीमा संकेत देती है कि दोनों पक्ष इसे केवल राजनीतिक घोषणा तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि शीघ्र क्रियान्वयन के लिए गंभीर हैं।यह एफटीए भारत और यूरोपीय संघ के बीच दशकों से चली आ रही बातचीत का परिणाम है। वर्षों तक मतभेद, जटिल नियम, पर्यावरणीय मानक, श्रम कानून और टैरिफ जैसे मुद्दे इस समझौते के मार्ग में बाधा बने रहे। किंतु बदले हुए वैश्विक परिदृश्य और भारत की बढ़ती आर्थिक क्षमता ने यूरोप को यह समझने पर मजबूर किया कि भारत को केवल एक उभरता बाजार नहीं,बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार के रूप में देखना आवश्यक है। भारत के लिए भी यह डील इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उसे उच्च-मूल्य वाले यूरोपीय बाजारों तक बेहतर पहुँच प्रदान करती है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में उसकी भूमिका को मजबूत बनाती है। साथियों बातें कर हम इस महाडील का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष सुरक्षा और रक्षा सहयोग से जुड़ा है इसको समझने की करें तो, दोनों पक्ष एक रक्षा ढांचा समझौते और एक रणनीतिक एजेंडे को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने के लिए तैयार हैं।यह संकेत देता है कि भारत और यूरोप अब केवल व्यापार तक सीमित सहयोग नहीं चाहते बल्कि समुद्री सुरक्षा,साइबर सुरक्षा,आतंकवाद- रोधी प्रयासों और रक्षा प्रौद्योगिकी में भी मिलकर काम करने के इच्छुक हैं। यूरोप जिस तरह अमेरिका और चीन पर अपनी अत्यधिक निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, उसमें भारत एक स्वाभाविक और भरोसेमंद विकल्प के रूप में सटीकता से उभरता है। साथियों बात अगर हम यूरोपीय संघ लंबे समय से स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी की बात करता रहा है इसको समझने की करें तो, यूक्रेन युद्ध के बाद यह आवश्यकता और भी तीव्र हो गई है, क्योंकि ऊर्जा, रक्षा और आपूर्ति श्रृंखलाओं में यूरोप को अपनी कमजोरियों का एहसास हुआ है। ऐसे में भारत जैसे लोकतांत्रिक, स्थिर और तेज़ी से बढ़ते देश के साथ रणनीतिक साझेदारी यूरोप के लिए न केवल आर्थिक बल्कि भू- राजनीतिक रूप से भी लाभकारी है। भारत के लिए यह साझेदारी इसलिए अहम है क्योंकि इससे उसे उन्नत रक्षा तकनीक, निवेश और वैश्विक मंच पर अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा। साथियों बातें कर हम भारतीय पीएम द्वारा महाडील के बाद कही गई छह प्रमुख बातों को समझने की करें तो वे इस समझौते की आत्मा को स्पष्ट करती हैं,पहली बात, यह एफटीए केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि साझा समृद्धि का नया ब्लूप्रिंट है।यह कथन दर्शाता है कि भारत इस समझौते को शून्य-योग खेल के रूप में नहीं देखता, बल्कि इसे पारस्परिक लाभ और दीर्घकालिक विकास की नींव मानता है।भारत की आर्थिक कूटनीति अब विन-विन मॉडल पर आधारित है, जहाँ व्यापार को विकास और स्थिरता का साधन माना जाता है।दूसरी बात पीएम ने इसे भारत के इतिहास का सबसे बड़ा फ्री ट्रेड एग्रीमेंट बताया। यह केवल शब्दों का चयन नहीं, बल्कि इस डील के व्यापक दायरे का संकेत है। यूरोपीय संघ विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और इसके साथ मुक्त व्यापार समझौता भारत को वैश्विक व्यापार मानचित्र में एक नई ऊँचाई पर ले जाता है। यह समझौता न केवल वस्तुओं के व्यापार को बढ़ाएगा, बल्कि सेवाओं, निवेश और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी नए अवसर पैदा करेगा।तीसरी महत्वपूर्ण बात किसानों और छोटे उद्योगों से जुड़ी है।पीएम ने स्पष्ट किया कि यह ऐतिहासिक समझौता भारत के किसानों और लघु उद्योगों के लिए यूरोपीय बाजारों तक पहुँच को आसान बनाएगा। यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का कृषि और एमएस एमई क्षेत्र लंबे समय से वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा की चुनौतियों से जूझ रहा है। यूरोपीय बाजार तक बेहतर पहुँच मिलने से भारतीय उत्पादों को उच्च मूल्य प्राप्त हो सकता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन को बल मिलेगा। चौथी बात मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टर से जुड़ी है। इस एफटीए से मैन्युफैक्चरिंग में नए अवसर पैदा होंगे और भारत के सेवा क्षेत्र,विशेषकर आईटी, स्वास्थ्य, शिक्षा और पेशेवर सेवाओं में यूरोप के साथ सहयोग और मजबूत होगा।मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों को यह समझौता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई ऊर्जा देगा। यूरोपीय निवेश और तकनीक के साथ भारतीय विनिर्माण वैश्विक मानकों पर खरा उतरने में सक्षम होगा।पाँचवीं बात भू-राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।पीएम ने कहा कि भारत और यूरोपीय संघ इंडो-पैसिफिक से लेकर कैरेबियन तक त्रि-पक्षीय परियोजनाओं का विस्तार देंगे। यह बयान दर्शाता है कि दोनों पक्ष अब केवल द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि तीसरे देशों में भी संयुक्त परियोजनाओं के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे। यह रणनीति वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए वैकल्पिक विकास मॉडल प्रस्तुत कर सकती है।छठी और अंतिम बात वैश्विक व्यवस्था से जुड़ी है।पीएम ने कहा कि भारत और यूरोपीय संघ का सहयोग विश्व के लिए अच्छा कदम है और बहुपक्षवाद व अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का सम्मान उनकी साझा परंपरा है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आज की चुनौतियों का समाधान करने के लिए वैश्विक संस्थानों में सुधार आवश्यक है। यह बयान संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन और अन्य बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार की भारत की लंबे समय से चली आ रही मांग को यूरोपीय समर्थन मिलने का संकेत देता है। इस महाडील का एक और महत्वपूर्ण पहलू वह है जिसे अप्रत्यक्ष प्रतिबंधों और टैरिफ अवरोधों के संदर्भ में देखा जा रहा है। हाल के वर्षों में भारतीय उद्योग जगत को कई देशों द्वारा लगाए गए टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं का सामना करना पड़ा है। इन बाधाओं को कई विश्लेषक टैरिफ रूपी स्पीड ब्रेकर के रूप में देखते हैं, जिनका उद्देश्य भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता को सीमित करना था। भारत-ईयू एफटीए इन अवरोधों को काफी हद तक तोड़ने में सक्षम होगा और भारतीय उद्योगों को वैश्विक बाजार में अधिक आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का अवसर देगा। साथियों हम इस डील को गहराई से देखें तो यह डील विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती है, जहाँ भारत को तकनीक, पूंजी और बाजार की आवश्यकता है, जबकि यूरोप को लागत-प्रभावी उत्पादन, युवा कार्यबल और तेजी से बढ़ते बाजार की जरूरत है। दोनों की यह पूरकता इस समझौते को दीर्घकालिक सफलता की ओर ले जा सकती है। इसके साथ ही, यह समझौता वैश्विक निवेशकों के लिए भी सकारात्मक संकेत भेजता है कि भारत स्थिर, विश्वसनीय और सुधारोन्मुखशानदार अर्थव्यवस्था है। साथियों अंतरराष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में देखें तो यह महाडील भारत को एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में स्थापित करती है। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव के बीच भारत और यूरोप का यह सहयोग वैश्विक व्यवस्था में एक तीसरा, अधिक स्थिर और नियम- आधारित विकल्प प्रस्तुत करता है। यह न केवल आर्थिक, बल्कि राजनीतिक और नैतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि दोनों पक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों, कानून के शासन और अंतरराष्ट्रीय नियमों में विश्वास रखते हैं। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि भारत-यूरोपीय संघ महाडील 21वीं सदी की बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की रणनीतिक सोच,आर्थिक आत्मविश्वास और कूटनीतिक परिपक्वता का प्रमाण है।यह समझौता भारत को केवल एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि एक वैश्विक नीति-निर्माता के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आने वाले वर्षों में इसका प्रभाव न केवल व्यापार के आँकड़ों में, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देगा।यही कारण है कि इसे केवल एक एफटीए नहीं, बल्कि मदर ऑफ ऑल डील कहा जाना पूरी तरह से सार्थक प्रतीत होता है। *-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र