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बजट 2026-27 @ विज़न 2047- लोकलुभावन के आगे आत्मनिर्भर विकसित भारत क़ी लाज़वाब वैश्विक रूपरेखा - Uturn Time
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बजट पेश होते ही शेयर मार्केट सोना चांदी के रेट धड़ाम से गिरे- शॉर्ट-टर्म लोकलुभावनवाद के बजाय दीर्घकालिक आर्थिक अनुशासन को प्राथमिकता!
बज़ट 2026 भारत को अगले दो दशकों में एक आत्मनिर्भर, तकनीकी रूप से सक्षम और वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करेगा -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया - वैश्विक स्तरपर भारत का आम बजट 2026 किसी चुनावी वर्ष की तात्कालिक लोकप्रियता की तलाश में गढ़ा गया दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र की आत्मविश्वासी घोषणा है जो अब अपने विकास की दिशा स्वयं तय करना चाहता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत यह बजट न तो भावनात्मक नारों से भरा है और न ही तात्कालिक राहतों की चकाचौंध में उलझा हुआ। हालांकि बजट पेश होते ही शेयर मार्केट सोना चांदी के रेट धड़ाम से गिरे बजट भाषण शुरू होने से पहले चला ग‍िरावट का दौर बजट स्‍पीच के बाद भी जारी रहा ग‍िरावट ग‍िरावट और स‍िर्फ ग‍िरावट, शेयर बाजार से लेकर सोने- चांदी तक में आज के द‍िन ग‍िरावट हावी रही, सोने-चांदी में ग‍िरावट का हाल यह रहा क‍ि प‍िछले एक से दो हफ्ते में ज‍ितना चढ़ा,उससे ज्‍यादा प‍िछले द‍िन में ग‍िर गया.परंतु इसकेविपरीत,मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यह बजट भारत को अगले दो दशकों में एक आत्मनिर्भर, तकनीकी रूप से सक्षम और वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करने की ठोस रूपरेखा पेश करता है।75 वर्षों से चली आ रही बजट प्रस्तुति की परंपरा में सूक्ष्म लेकिन अर्थपूर्ण बदलाव करते हुए इस बार बजट के वैचारिक और नीतिगत केंद्र को नए सिरे से परिभाषित किया गया है, जो अपने आप में एक संकेत है कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया देने वालीअर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि रणनीति गढ़ने वाला राष्ट्र बन चुका है।पिछले दशकों में केंद्रीय बजटों की संरचना ऐसी रही है जिसमें भाग ‘ए’ में व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण और सरकार की प्राथमिकताएं रखी जाती थीं, जबकि भाग ‘बी’ को कर सुधारों और नीतिगत घोषणाओं तक सीमित कर दिया जाता था।बजट 2026 में इस परंपरा से हटते हुएनीतिगत घोषणाओं को आर्थिक दर्शन से अलग नहीं रखा गया, बल्कि दोनों को एक ही निरंतर कथा में पिरोया गया है। यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं,बल्कि वैचारिक है। इसका अर्थ है कि सरकार अब कर नीति, पूंजी निवेश, तकनीकी मिशन और सामाजिक ढांचे को अलग- अलग खानों में नहीं देखती, बल्कि उन्हें एक साझा राष्ट्रीय लक्ष्य की ओर अग्रसर उपकरण मानती है। पेपरलेस बजट की निरंतरता और लाल कपड़े से आगे डिजिटल युग की प्रस्तुति यह दर्शाती है कि शासन की भाषा और संरचना दोनों आधुनिक भारत के साथ कदम से कदम मिला रही हैं। साथियों बात अगर हम 1 फरवरी 2026 को पेश हुए बजट की करें तो,यह बजट ऐसे समय में आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिरता, भू- राजनीतिक तनाव और सप्लाई- चेन पुनर्संरचना के दौर से गुजर रही है।अमेरिका- चीन व्यापार तनाव, यूरोप की ऊर्जा चुनौतियां और उभरते बाज़ारों पर बढ़ता कर्ज़ दबाव इन सभी के बीच भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह शॉर्ट-टर्म लोक लुभावनवाद के बजाय दीर्घकालिक आर्थिक अनुशासन को प्राथमिकता देगा। वित्तमंत्री ने अपनें 90 मिनट के भाषण की शुरुआत ही निरंतरता, स्थिरता और दीर्घकालीन विकास की सोच से की,जो अपने आप में यह संदेश था कि यह बजट किसी एक वर्ष की नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की दिशा तय करने वाला दस्तावेज़ है। चौंकाने वाली घोषणाओं की अनुपस्थिति को कमजोरी नहीं, बल्कि सटीक रूप से रणनीतिक परिपक्वता के रूप में देखा जाना चाहिए। साथियों बात अगर हम इस बजट की सबसे हटकर बात की करें तो सरकार इस बजट में आर्थिक अनुशासन और जनता की आकांक्षाओं के बीच जिस संकरी राह पर चलती दिखती है, वह भारत जैसे विकासशील लेकिन महत्वाकांक्षी राष्ट्र के लिए अनिवार्य भी है। राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण रखते हुए विकास को गति देना किसी भी सरकार के लिए आसान कार्य नहीं होता, विशेषकर तब जब सामाजिक कल्याण,रोजगार सृजन और बुनियादी ढांचे की मांगें एक साथ खड़ी हों। बजट 2026 ने यथार्थवादी और संयमित रुख अपनाते हुए यह स्वीकार किया है कि विकास का स्थायित्व केवल खर्च बढ़ाने से नहीं,बल्कि खर्च की गुणवत्ता सुधारने से आता है। यही कारण है कि इस बजट का केंद्रीय तत्व ‘कैपेक्स- ड्रिवन ग्रोथ’ है, न कि सब्सिडी- ड्रिवन कंजम्पशन।इस सोच का सबसे ठोस प्रमाण सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 की घोषणा में दिखाई देता है।वैश्विक तकनीकी परिदृश्य में सेमीकंडक्टर अब केवल इलेक्ट्रॉनिक्स का घटक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, औद्योगिक आत्मनिर्भरता और भू- राजनीतिक शक्ति का प्रतीक बन चुके हैं।लगभग 40,000 करोड़ रूपए के निवेश के साथ इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 यह स्पष्ट संकेत देता है कि भारत अब केवल डिज़ाइन और सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि हार्डवेयर निर्माण की वैश्विक वैल्यू-चेन में भी निर्णायक भूमिका निभाना चाहता है। यह पहल न केवल आयात निर्भरता कम करेगी, बल्कि भारत को एशिया- प्रशांत क्षेत्र में एक विश्वसनीय सेमीकंडक्टर हब के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखती है।पूंजीगत व्यय में प्रस्तावित वृद्धि इस बजट की रीढ़ है। वित्तवर्ष 27 के लिए 13.2 लाख करोड़ रूपए का कैपेक्स, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 9 प्रतिशत अधिक है, केवल एक संख्या नहीं बल्कि सरकार की प्राथमिकताओं का स्पष्ट संकेत है। बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा और शहरी विकास में यह निवेश रोजगार सृजन के साथ-साथ निजी निवेश को भी आकर्षित करने का माध्यम बनेगा। आर्थिक इतिहास गवाह है कि जब सरकार पूंजीगत व्यय पर जोर देती है,तो उसका मल्टीप्लायर प्रभाव अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में महसूस किया जाता है। इस दृष्टि से बजट 2026 एक क्लासिक क्राउड-इन रणनीति को अपनाता दिखता है, जिसमें सरकारी निवेश निजी क्षेत्र के लिए रास्ते खोलता है। इसी रणनीति का विस्तार हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की घोषणाओं में भी दिखाई देता है। मुंबई-पुणे, हैदराबाद-बेंगलुरु और दिल्ली- वाराणसी जैसे मार्ग केवल परिवहन परियोजनाएं नहीं हैं,बल्कि शहरी- औद्योगिक क्लस्टरों को जोड़ने वाले विकास गलियारे हैं। सात हाई-स्पीड रेल मार्गों की घोषणा यह संकेत देती है कि भारत अब केवल सड़कों और पारंपरिक रेलवे तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि भविष्य की मोबिलिटी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए निवेश कर रहा है। ये कॉरिडोर क्षेत्रीय आर्थिक असंतुलन को कम करने, पर्यटन को बढ़ावा देने और समय-लागत में कमी लाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।रेयर अर्थ कॉरिडोर और ईस्ट-वेस्ट फ्रेट कॉरिडोर की योजना वैश्विक संसाधन राजनीति के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है ओडिशा केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में रेयर अर्थ संसाधनों का विकास भारत को उन रणनीतिक सामग्रियों में आत्मनिर्भर बना सकता है जिन पर आज चीन का प्रभुत्व माना जाता है। यह पहल न केवल औद्योगिक सुरक्षा को मजबूत करेगी,बल्कि इलेक्ट्रिक वाहन,रिन्यूएबल एनर्जी और रक्षा क्षेत्र में भारत की क्षमता को भी नई ऊंचाई देगी। फ्रेट कॉरिडोर के माध्यम से लॉजिस्टिक्स लागत में कमी और सप्लाई-चेन की दक्षता बढ़ाना भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए अनिवार्य है।एमएसएमई क्षेत्र को लेकर बजट 2026 का दृष्टिकोण भी उल्लेखनीय है। 10,000 करोड़ रूपए के एसएमई ग्रोथ फंड की स्थापना यह स्वीकार करती है कि भारत की आर्थिक रीढ़ छोटे और मध्यम उद्यम हैं। वित्तीय और तकनीकी सहायता के माध्यम से इन उद्यमों को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से जोड़ना रोजगार सृजन और निर्यात वृद्धि के लिए आवश्यक है। यह पहल केवल क्रेडिट उपलब्धता तक सीमित नहीं, बल्कि स्किल, टेक्नोलॉजी और मार्केट एक्सेस को भी संबोधित करती है, जो लंबे समय से एमएसएमई सेक्टर की कमजोर कड़ी रही है।बायोफार्मा शक्ति योजना के अंतर्गत अगले पांच वर्षों में 10,000 करोड़ रूपए का निवेश भारत को वैश्विक स्वास्थ्य आपूर्ति श्रृंखला में और अधिक मजबूत स्थान दिला सकता है। कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया था कि फार्मास्यूटिकल आत्मनिर्भरता किसी भी देश के लिए रणनीतिक आवश्यकता है। बायोफार्मा क्षेत्र में अनुसंधान, उत्पादन और नवाचार को बढ़ावा देकर भारत न केवल घरेलू जरूरतें पूरी कर सकेगा, बल्कि विकासशील देशों के लिए भरोसेमंद स्वास्थ्यभागीदार भी बन सकता है। साथियों बात अगर हम कर सुधारों के संदर्भ में बजट को समझने की करें तो,2026 ने सरलता और पारदर्शिता को प्राथमिकता दी है। आयकर अधिनियम के नवीनतम रूप के तहत नियमों का सरलीकरण, संशोधित रिटर्न फाइलिंग की समय सीमा में बदलाव और टीडीएस-टीसीएस में राहत जैसे कदम कर अनुपालन को आसान बनाने की दिशा में उठाए गए हैं।यह दृष्टिकोण दंडात्मक कर संस्कृति से हटकर ‘ट्रस्ट-बेस्ड टैक्सेशन’ की ओर बढ़ने का संकेत देता है, जो निवेशकों और करदाताओं दोनों के लिए सटीक सकारात्मक संदेश है। साथियों बात अगर हम पर्यावरणीय खुर्जा जलवायु और बजट के तालमेल को समझने की करें तो इस आयाम को नजर अंदाज किए बिना बजट ने कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज तकनीक के लिए 20,000 करोड़ रूपए का प्रस्ताव रखा है।यह कदम यह दर्शाता है कि भारत विकास और पर्यावरण संरक्षण को परस्पर विरोधी नहीं मानता, बल्कि उन्हें पूरक मानकर चलता है। ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाते हुए यह निवेश भारत को ग्रीन ट्रांजिशन का नेतृत्वकर्ता बना सकता है।मध्यम और छोटे शहरों के लिए प्रस्तावित सिटी इकोनॉमिक रीजन योजना शहरीकरण की नई सोच को प्रतिबिंबित करती है। प्रत्येक क्षेत्र के लिए 5,000 करोड़ रूपए के चुनौती-मोड निवेश यह संकेत देते हैं कि विकास केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहेगा। यह पहल क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने, स्थानीय रोजगार सृजन और संतुलित शहरी विकास के लिए निर्णायक साबित हो सकती है।जलमार्ग और हवाई जैसे ढांचागत विकास की घोषणाएं भी इस बजट की समग्र दृष्टि को रेखांकित करती हैं। अगले पांच वर्षों में 20 नए राष्ट्रीय जलमार्गों की शुरुआत और नेशनल वाटरवेज को सक्रिय करने की योजना लॉजिस्टिक्स में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। कम लागत, कम कार्बन उत्सर्जन और अधिक क्षमता ये तीनों लाभ जलमार्ग परिवहन को भविष्य का विकल्प बनाते हैं।इन सभी पहलों के बीच यह भी महत्वपूर्ण है कि बजट 2026-27 में पहले ही पूंजीगत व्यय को 15 लाख करोड़ तक बढ़ाया गया था, जो यह दर्शाता है कि सरकार का कैपेक्स- फोकस कोई एक- वर्षीय प्रयोग नहीं, बल्कि निरंतर नीति है। यह निरंतरता निवेशकों, उद्योग और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए विश्वास का आधार बनती है। अतःअगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि समग्र रूप सेदेखा जाए तो बजट 2026 किसी लोक लुभावन कथा का विस्तार नहीं, बल्कि भारत के दीर्घकालिक आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनने की ठोस रणनीति है। यह बजट वैश्विक मंच पर भारत को एक जिम्मेदार, अनुशासित और दूरदर्शी अर्थव्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करता है ऐसी अर्थव्यवस्था जो आज के लाभ के लिए कल को गिरवी नहीं रखती, बल्कि भविष्य की नींव वर्तमान में ही मजबूत करती है। *-संकलनकर्ता लेखक - कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318*